← Back

श्री विश्वकर्मा चालीसा

॥ दोहा ॥ श्री विश्वकर्मा प्रभु वन्दौं, चरन कमल धरि ध्यान। श्री जय कारी, श्री शुभ कारी, सकल विघ्न कर नाश ॥ ॥ चौपाई ॥ जय श्री विश्वकर्मा भगवाना। जय विश्वेश्वर कृपा निधाना ॥ शिल्प कला कौशल्य प्रभु रूपा। तुम हीं सृष्टि के आदि अनूपा ॥1॥ अति विशाल तुम देव कहाये। विश्व के शिल्पी तुम हीं गाये ॥ अष्ट सिद्धिनव निधि के दाता। तुम्हीं हो सबकी भाग्य विधाता ॥2॥ देव-दनुज सब तुम्हीं को ध्यावैं। सब विधि सुख तुम्हीं से पावैं ॥ विश्वकर्मा तुम बड़े दयाला। दूर करो सबके कष्ट कराला ॥3॥ तुम हीं हो विश्व के निर्माता। तुम हीं हो सबके सुख दाता ॥ तुमने हीं स्वर्गपुरी सजाई। इन्द्र की शोभा अतिहि सुहाई ॥4॥ सूर्य रथ तुमने हीं बनाया। तेज तुम्हीं ने अति बरसाया ॥ द्वारिका नगरी तुम हीं बनाई। स्वर्ण महल की शोभा सुहाई ॥5॥ लंका गढ़ की रचना कीन्ही। रावण को तुमने हीं दीन्ही ॥ विमान पुष्पक तुमने बनाया। जिससे जग का भेद मिटाया ॥6॥ देव-शिल्पी तुम अति बलकारी। तुम्हीं हो सबके कष्ट निवारी ॥ जो जन तुम्हे नित्यहि ध्यावै। सर्व मंगल वह निश्चय पावै ॥7॥ तुम्हरे नाम से पाप नसावै। दुःख दरिद्र निकट नहिं आवै ॥ विश्वकर्मा जो कोई ध्यावै। सुख-सम्पत्ति वो निश्चय पावै ॥8॥ नाम तुम्हारा लेते ही स्वामी। पूर्ण होय सब काम ॥ धन-धान्य और यश-कीर्ति पावै। जन्म-जन्म का दुःख मिटावै ॥ यह चालीसा भक्ति से गावै। विश्वकर्मा कृपा निश्चय पावै ॥9॥ ॥ दोहा (समापन) ॥ श्री विश्वकर्मा चालीसा, जो पढ़े मन लाई। ता पर कृपा होय प्रभु की, मिले परम सुखदाई ॥

अधिक चालीसा पाठ देखें

←Back