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श्री सरस्वती चालीसा

॥ दोहा ॥ जननी जनक के चरन कमल, बंदउँ बारहिं बार। बुद्धि प्रकाशिनि माँ सरस्वती, देहु सुमति अनुसार ॥ ॥ चौपाई ॥ जय श्री सकल बुद्धि बल रासी। जय ज्ञान दीप गुणन की खासी ॥ जय जय विद्या धन की दाता। तुम हीं माँ शारद जग माता ॥1॥ श्वेत कमल पर बैठी सुहावन। हंसवाहिनी तुम मन भावन ॥ वीणा पुस्तक कर में सोहे। सब जग को यह रूपहि मोहे ॥2॥ तुम हो विद्या ज्ञान स्वरूप। तुम हीं हो शारद को अनूप ॥ चतुर्भुज रूप तुम्हारा राजत। हंस पर बैठी तुम हीं साजत ॥3॥ मात सरस्वती तव शुभ नामा। करत ज्ञान का तुम हीं कामा ॥ तुम हीं हो वाणी की देवी। सुर नर मुनि सब करत तुहारी सेवी ॥4॥ तुम बिन ज्ञान कहाँ से पाऊँ। मूर्ख हूँ मैं, कैसे गुण गाऊँ ॥ ऋषि मुनि तुम्हे नित्यहि ध्यावैं। ज्ञान ध्यान तप तुम्हीं से पावैं ॥5॥ तुमने ही ब्रह्मा को ज्ञान दिया। जग में विद्या का प्रचार किया ॥ विष्णु को दिया ज्ञान अनमोल। तुमने ही खोले बुद्धि के पोल ॥6॥ शिव को भी तुमने ही ज्ञान दिया। अन्तर में तुम ने ही वास किया ॥ तुम हो देवी आदि भवानी। सब जग में तेरी महिमा जानी ॥7॥ सूर्य चन्द्र तुम हीं उपजाए। ग्रह नक्षत्र सब तुम्हीं से आए ॥ तुम्हीं हो काली, तुम्हीं हो तारा। मुक्त कराती भव से पारा ॥8॥ तुम्हें पूजे सब राज-रजवाड़े। तुम बिन कोई काज न संभारे ॥ ज्ञान के सागर की तुम रानी। तुम ही हो विद्या की जननी ॥9॥ जो जन तुमको नित्य मनावे। ज्ञान-ध्यान सुख-सम्पत्ति पावे ॥ विद्या की देवी तुम हितकारी। भक्तों के तुम कष्ट निवारी ॥10॥ करो कृपा हे मातु दयाला। ज्ञान-भक्ति दो, करहु निहाला ॥ विद्याहीन जो तुम्हे ध्यावै। सो नर सुख-सम्पत्ति पावै ॥ सरस्वती चालीसा जो गावै। मनवांछित फल निश्चय पावै ॥11॥ दोहा (समापन) सकल ज्ञान की देवी तुम, तुम हीं बुद्धि विशाल। भव सागर से तार माँ, मेरी रखियो लाज ॥

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