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श्री संतोषी माता चालीसा
॥
दोहा ॥
बन्दौं वीणा वादिनी, कमल निवासिनी देवि।
सन्तोषी धरूँ ध्यान मम, सकल करौ मम सेवि ॥
श्री सन्तोषी माँ तुमको मैं, नित नित करूँ प्रणाम।
कृपा दृष्टि रखना मुझ पर, पूर्ण करौ सब काम ॥
॥
चौपाई ॥
जय सन्तोषी माँ जग जननी।
करो कष्ट दूर, हे भवानी ॥
शुक्रवार प्रिय मानत सोई।
प्रेम सहित पूजा जोई ॥1॥
सुन्दर रूप चतुर्भुज धारी।
श्वेत वस्त्र तुम हो प्रियकारी ॥
शंख, चक्र, गदा, पद्म बिराजत।
मूषक वाहन तुम पर राजत ॥2॥
तुम ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश।
तुम्हीं आदिशक्ति, शेष ॥
तुम्हीं शारदा, तुम्हीं कमला।
तुम्हीं हो सबकी भाग्य विधाता ॥3॥
तुम्हीं हो गंगा, यमुना, सरस्वती।
तुम्हीं हो सबकी भाग्य ज्योति ॥
तुम्हारे रूप अनेक हैं माता।
भक्तों के तुम हो सुखदाता ॥4॥
सत्य प्रेम से पूजा करे जो।
सुख-सम्पत्ति निश्चय पावे सो ॥
गुड़ और चना का भोग लगावे।
सन्तोषी माता को मनावे ॥5॥
अमर बेल की बेल लगावे।
जो माँ तेरी महिमा गावे ॥
व्रत करे जो सोलह शुक्रवार।
मिले उसे निश्चित फल चार ॥6॥
सन्तोषी माँ जब कृपा करै।
जन्म-जन्म के पाप हरै ॥
रिद्धि-सिद्धि के तुम हो दाता।
पुत्र-पौत्र की तुम हो माता ॥7॥
दीन दुखी पर दया करै जो।
तुम्हरी शरण में आकर रहे जो ॥
तुम्हारी महिमा अपरम्पार।
कोई न पावे तेरा पार ॥8॥
संकट कटै मिटै सब पीरा।
ध्यान धरै जो कोई वीरा ॥
निर्धन को धन तुम ही देती।
सुख-शान्ति की वर्षा करती ॥9॥
तुम्हारे बिना काम ना होवे।
तुमरे बिन न कोई मन मोहे ॥
भवसागर से पार उतारो।
सन्तोषी माँ हमारा दुःख टारो ॥10॥
नाम तुम्हारा लेते ही माता।
सकल विघ्न टर जाते जाता ॥
रोग दोष सब दूर भगाओ।
सुख समृद्धि घर में लाओ ॥
तुम्हारी जय जयकार करे जो।
जीवन में आनन्द भरे जो ॥11॥
दोहा (समापन)
सन्तोषी माँ चालीसा, पढ़े जो कोई भक्त।
सुख सम्पत्ति घर आवे, दुःख से होवे मुक्त॥