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श्री अन्नपूर्णा चालीसा
॥
दोहा ॥
विश्वेश्वरवरदायिनी, अन्नपूर्णे देवि।
कृपासिन्धु मम नित्य ही, नमो नमामि सेवि ॥
दीन-हीन बालक हूँ तेरा, सदा करौ तुम वास।
आस करूँ इस जग की माता, पूरण मेरी आस ॥
चौपाई
नमो नमो श्री अन्नपूर्णा।
भुवन-भुवन की तुम हो पूर्णा ॥
काशीपुरी निवासिनि माता।
अन्नदान शुभ करी विधाता ॥1॥
तेरा नाम नित्य जो गावै।
धन-धान्य से पूरण पावै ॥
अन्नपूर्णा देवी तुम ही हो।
सब जग की जननी तुम ही हो ॥2॥
तुमरे नाम से सब सुख पावें।
दुःख दरिद्र निकट नहिं आवें ॥
तुम्हीं हो काली, तुम्हीं हो तारा।
मुक्त कराती भव से पारा ॥3॥
तुम ही गौरी, तुम हीं सीता।
तुम ही हो सबकी भाग्य विधाता ॥
क्षीर सागर में कियो विलासा।
पूजन करें शिव, विष्णु, ब्रह्मासा ॥4॥
अन्नदान से सबको पाला।
तुम हीं हो जग की रखवाला ॥
तुम्हीं हो माया, तुम्हीं हो छाया।
तुम्हरे सब जग मोह भरमाया ॥5॥
तुम्हरे गुण गावैं जो कोई।
दुःख दरिद्र से मुक्त हो सोई ॥
अन्नपूर्णा तुम हो जगमाता।
करो कृपा हे भाग्य विधाता ॥6॥
देव-दनुज सब तुम्हीं को ध्यावैं।
सब विधि सुख तुम्हीं से पावैं ॥
तुम्हीं हो ज्ञान, तुम्हीं हो भक्ति।
तुम हीं हो जीवन की शक्ति ॥7॥
तुम्हारी महिमा वेद बखाने।
ऋषि मुनि सब तुम्हीं को जाने ॥
तुम्हीं हो जननी, तुम्हीं हो देवी।
तुम ही हो सबकी सुखसेवी ॥8॥
जो यह चालीसा पाठ करावै।
मनवांछित फल निश्चय पावै ॥
धन-धान्य से पूरण होई।
रोग दोष से मुक्त हो सोई ॥
भक्ति भाव से जो कोई गावै।
अन्नपूर्णा कृपा निश्चय पावै ॥9॥
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दोहा (समापन) ॥
जो नित ध्यावै देवि को, सन्तोष पावै सोय।
अन्नपूर्णा माता की, जय जय जय होय ॥